कुछ जवानी के किस्से ऐसे भी हैं,
अधरों से अधरों तक आते – आते
उम्र गुजर गयी.
संसार में, हर कोई स्वघोषित बाजीगर है
खेलना तो दूर साहब
बस दूसरों पे हंसने में उम्र गुजर गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ जवानी के किस्से ऐसे भी हैं,
अधरों से अधरों तक आते – आते
उम्र गुजर गयी.
संसार में, हर कोई स्वघोषित बाजीगर है
खेलना तो दूर साहब
बस दूसरों पे हंसने में उम्र गुजर गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
हर ख्वाब के टूटने पर
एक समंदर बनता है.
कोई बहा देता है आँखों से
कोई दिल के अंदर रखता है.
मोहब्बत तो बस एक दरिया है
कोई डूब-डूब के पीता है
और कोई पी – पी के डूबता है.
परमीत सिंह धुरंधर
सफर कीजिये
किसी के साथ मगर.
क्या पता कब जरुरत पड़ जाए?
गुरुर कीजिये जवानी पर
शादी के बाद मगर.
क्या पता कब आपकी जवानी
किसी के हाथों का खिलौना बन जाए?
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी लड़ाई
मेरे अस्तित्व की नहीं
मेरे अंतरात्मा की बन गयी है.
मेरे सही या गलत की नहीं
मेरे विश्वास की बन गयी है.
मैं जानता हूँ
की मैं टूट रहा हूँ
पिछड़ रहा हूँ
थक रहा हूँ
पर इन सबके बावजूद
मेरा टीके रहना जरुरी है
उस बरगद की तरह
जिसके नीचे क्या ?
दूर – दूर तक कोई और पेड़ – पौधा
नहीं होता।
जी हाँ जब जिंदगी आप की
बरगद हो तो
लोग दूर -दूर ही रहते हैं
की कहीं विकास ना रुक जाए.
कहीं भुत – पिचास न पकड़ ले.
ये तो वो ही इनकी छावं में आते है
बैठते हैं
जो मुसाफिर हों, राही हो
जिनकी मज़बूरी है थकान मिटाने की.
या फिर प्रेमी-युगल हो
जिनकी मज़बूरी हो निवस्त्र हो कर भी
एक वस्त्र या चादर के आड़ की.
बरगद, जिसके कोई करीब नहीं
बरगद, जिसके फल की किसी को चाह नहीं।
बरगद, जिसके गिरने पे आँधियों में
एक धाराम सी आवाज होती है
और गावं समझ जाता है
और जब गिरता है बरगद तो
या तो रात का अँधेरा और सनाटा होता है
या फिर ऐसा तूफ़ान जो दिन में भी
सबको घरों में छिपने को विवस कर दे.
तब उस अँधेरे से और उस तूफ़ान से सिर्फ
वो बरगद ही जूझता है.
और वो गिरना भी देखिये
की उसी पल से लोग उत्सव मनाते हैं
बच्चे उछाल -उछाल कर लांघते हैं
विजय-उल्लास की तरह.
और लोग ज्यादा -ज्यादा धो लेना चाहते हैं
उसे चूल्हे या अलाव में लगाने को.
गिरना भी ऐसा हो और मौत भी ऐसा हो
की जन-सैलाब उमड़ उठे.
भीष्म की सैया पे
पांडव – कौरव क्या?
कर्ण, दुर्योधन, गांधारी, धृतराष्ट,
ही नहीं
स्वयं जगत के पालनहारी
कृष्णा कराह उठे.
परमीत सिंह धुरंधर
रक्त की हर बून्द में प्यास रक्तपात की
वो राजपूत नहीं, जसके आँखों में ख्वाब नहीं
कुरुक्षेत्र में शंखनाद की.
जो लोट गए हैं अकबर की चरणों में जाकर
उनके नस – नस को एहसास नहीं
राजपूतों के इतिहास की.
परमीत सिंह धुरंधर
वरसों से जमाई थी हमने दही पे छाली,
काट गयी वो सजाव सिकहर पर चढ़कर साली।
परमीत सिंह धुरंधर
अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
जिंदगी के ग़मों को समझने वाली,
कोई तो एक घरवाली होती।
अपने नयनों से जो मन को,
बाँध लेती।
और आपके दिल की भी,
शहजादी होती।
रातों में चाँद शिकायतें,
जो करती।
मगर दिन में फिर से,
हिरन सी कुलांचें भी भरती।
अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
सेज पे हमारे भी कोई संगनी होती।
परमीत सिंह धुरंधर
अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
यूँ जिंदगी भर की,
अय्यासी ना होती।
आप दिखला देते अब भी राह,
ऊँगली पकड़ कर.
यूँ भटकती जिंदगी ना होती।
झोपडी में ही सही,
अपनी चारपाई पे भी एक लुगाई होती।
यूँ विशाल महलों में,
तन्हाई ना होती।
चूल्हे पे सेंकी रोटी होती,
और उसपे किसी के मायके की घी भी लगती।
यूँ ही विरयानी और पिज़्ज़ा से,
पेट की भूख न मिटती।
रात के समन्दर में,
यूँ साथी न मिलता हर बार.
घर के चार दीवारों में भी,
एक कहानी होती।
वशिष्ठा सी जमी होती,
गृहस्ती।
इंद्रा सी व्याकुल और
अधीर साँसें ना होती।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी किस्मत में तेरी चाहत ही नहीं,
मैं हूँ एक आवारा बादल,
मुझे कोई तुझसे शिकायत भी नहीं।
तू एक रात जो मेरे पास ठहर जाए,
मैंने अपनी दुआ में,
अगली कोई सुबह मांगी भी नहीं।
तेरी चोली के बटन पे माना है Khattri का साया,
पर तेरी चोली के बटन,
कोई Crassa सा तोड़ता भी तो नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ ही नहीं तेरे लिए अपना खून बहाऊंगा,
तू कभी मिल तो सही तुझे अपना लहू पिलाऊंगा।
तेरी मंशा अगर मुझे मिटाने की ही है साकी,
तो अपने अधरों पे रख के दे, विष भी पि लूंगा।
शिव का भक्त हूँ,
मेरा प्रेम कोई चंचल नहीं है.
तुझे अगर चाहत है आभूषणों और दौलत की,
तो मैं वो गृहस्थ नहीं बन पाउँगा।
मेरी आदत है अकेला ही चलने की,
भीड़ को मैं अपने साथ नहीं रखता।
तुम्हे अगर चाहत है सत्ता की,
तो मेरा साथ छोड़ दो,
मैं अपने बगावत के रंग नहीं बदल पाउँगा।
Dedicated to Baba Nagarjuna
परमीत सिंह धुरंधर