कब मानव बाँध पाया है सागर दुबारा?


गुजरा हुआ ज़माना हमें बुलाता ही रहा
बढ़ चले जो हम तो मुश्किल था लौटना हमारा।
अडिग रहे तो तट पे तो
सागर को भी छोड़ना पड़ा पथ हमारा।

और जब भी लिखा जाएगा इतिहास
हमेसा श्रीराम ही गलत होंगें इतिहासकारों की नजर में
मगर कब मानव फिर बाँध पाया है सागर दुबारा?

परमीत सिंह धुरंधर

अब तो उतरो महादेव


पल – पल में अधूरापन
पल – पल में निराशा है.
अब तो महादेव आपका
ही बस सहारा है.

समस्त ब्रह्माण्ड को जितने वाले
रघुकुल पे भी दुर्भाग्य का साया है.
अब तो उतरो महादेव
भगीरथ ने पुकारा है.

प्रचंड गंगा के समक्ष
विष्णु, ब्रह्मा, समस्त जग हारा है.
अब तो महादेव आपका
ही बस सहारा है.

अब तो महादेव आपका
ही बस सहारा है.
अब तो उतरो महादेव
भगीरथ ने पुकारा है.

परमीत सिंह धुरंधर

शायद मुझमें चालाकी न थी


हौसलों की कमी न थी
पर शायद मुझमें चालाकी न थी.
मेरी किश्ती डूबी उन किनारों पे
जहाँ लहरों की ख्वाइस भी ऐसी न थी.

परमीत सिंह धुरंधर

पिछड़ा – पिछड़ा महसूस करता हूँ


बुलंदियों की चाहत में ऐसे भाग रहे है लोग आगे – आगे
की मैं दिल के हाथों मजबूर, पिछड़ा – पिछड़ा महसूस करता हूँ.
ऐसे तोड़ गयी वो दिल मेरा मोहब्बत में
की खुशियों की हर बेला में तन्हा – तन्हा महसूस करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

29 Nov


इस शहर के हर मोड़ पे अकेला – अकेला सा महसूस करता हूँ
घर किसी का भी टूटे, मैं टुटा – टुटा सा महसूस करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

मराठी-मुलगी और बिहारी लट्टू


कुटे-कुटे चली रानी
कुटे-कुटे तू
सांग ज़रा नैनों से
कब करेगी गुटर-गू.

बरसने लगे हैं बादल
उठने लगी है मिटटी से खुसबू।
गूंजने लगे हैं भोंरे
और चमकने लगे हैं जुगनू।
सांग ज़रा नैनों से
कब करेगी गुटर-गू.

तू बसंत सी खिली – खिली
मैं निशाचर उल्लू।
तू मराठी-मुलगी
और मैं बिहारी लट्टू।
सांग ज़रा नैनों से
कब करेगी गुटर-गू.

परमीत सिंह धुरंधर

शिव विष धारण कर गए


जिंदगी को जीने का
अपना – अपना विचार है.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
सोने की लंका का त्याग कर
कैलास को पावन कर गए.
भगीरथ के एक पुकार पर
प्रबल-प्रचंड गंगा को
मस्तक पर शिरोधार्य कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

गर्व का त्याग कर
कृष्णा सारथि बने कुरुक्षेत्र में.
सब सुखों का श्रीराम
परित्याग कर गए.
हिन्द की इसी धरती पे
जब रचा गया चक्रव्यूह
तो वीरता के अम्बर को
अभिमन्यु दिव्यमान कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरी खतों के सहारे


हम भी जवानी में जिगर रखते थे
अब बस तेरी यादें हैं, तेरी खतों के सहारे।
कभी हौसला हमारा भी था तूफानों से टकराने का
अब सीने में तूफ़ान रखते हैं, तेरी यादों के सहारे।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


समंदर भी कहाँ शांत है हवाओं का जोर से?
तन्हा – तन्हा सा मैं तन्हाइयों का शोर में.
जो समझते हैं मसीहा खुद को इस दौर है
उन्हें क्या पता, कब क्या हो जाए, किसी मोड़ पे?

परमीत सिंह धुरंधर

शहर


जिसको भी आता है घोंषला बनाना
इस शहर में उसी का घोंषला नहीं है.

कैसे सवारोगे किस्मत को Crassa?
किस्मत में बस यही एक चीज़ लिखी नहीं है.

उड़ रहे हैं बहुत परिंदे आसमा में
मगर दूर – दूर तक इनका कोई आशियाना नहीं है.

संभालना सिख लो गलियों में ही
ये शहर देता दोबारा मौका नहीं है.

उजड़ा है मेरा गुलिस्ता यहीं पे कभी
मगर शहर ये अब भी शर्मिन्दा नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर