मेरे सीने पे चोट हो,
और दर्द उनके सीने पे.
ऐसा इश्क़ अब कहाँ?
लैला रो दे मजनू के गिरने पे.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सीने पे चोट हो,
और दर्द उनके सीने पे.
ऐसा इश्क़ अब कहाँ?
लैला रो दे मजनू के गिरने पे.
परमीत सिंह धुरंधर
वक्त ने कुछ ऐसे
बिहारियों को बिखेरा है.
की कैलिफोर्निया से मारिसस तक
बस भोजपुर और भोजपुरिया का जलवा है.
जहाँ हर उम्मीद टूट जाती है
गहन अँधेरे के तले दब कर.
वहाँ भी हमने अपनी स्वर-संस्कृति-संगीत से
अपनी माटी का दिया जलाया है.
कुछ जलते हैं
कुछ हँसते हैं
कुछ हमें मिटाने की
हसरते पाले हैं.
मगर जंगली फूल ही सही
खुसबू विहीन, रंगहीन ही सही
हमने अपने खून -पसीने से
बंजर को भी गुलशन बनाया है.
परमीत सिंह धुरंधर
लचक होनी चाहिए जिंदगी में पतंगों सी,
दूर तक सफर करती हैं, कट के भी.
आसमाँ को छूने की ललक इतनी है,
की हवाओं का जोर जितना,
उतना ही ऊंचा हैं उठती।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे नजरों के मयखानों में डूब जाऊं,
और तू ना निकलने दे.
अगर निकल जाऊं तो तू फिर,
किसी और नजर पे ना बहकने दे.
मुझे याद है तेरा,
जुल्फों को यूँ ही आगे – पीछे करना।
इन्हे अब मेरी रात बना दे,
या फिर बन घटा बन कर बरस जाने दे.
परमीत सिंह धुरंधर
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
करवाचौथ के उपवास हमारा नाम पे
हर सोमारी सावन के हमरे खातिर करत रहलू।
शिव जी से हमरे के माँगत हर बार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
अइसन कउनो ना इतवार नागा भइल,
जब तू ना हमारा बथान में ओंघाइलु।
हमरा बैलन के तू ख़ास प्यार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
खोटत हमरे खेतिया के साग रहलू,
हमरे बगिया के कचनार रहलू।
हमरे खटिया पे सवार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
परमीत सिंह धुरंधर
अंग – अंग खिल के कठोर भइल बा,
भौजी भैया से कह तनी ढूँढअस,
हमारा जोड़ के कोई लइका।
सखी – सहेली सब तहरा खानी,
जाके बइठ गइली अपना ससुरा,
केकरा संगे अब खेले जाईं सबके अँगना।
परमीत सिंह धुरंधर
वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
सर्प सा जीवन
बिल में संकुचित हो.
या नभ में अनंत तक,
विस्तृत हो विस्तार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
सोच लो, विचार लो,
सौ साल के जीवन में,
साँसों पे बोझ हो.
या शोषण की कालजयी बेड़ियों पे,
बन काल,
प्रहार हो, प्रहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
स्वर्ग से देवता नहीं आयेंगें योगदान को,
नारियों के गर्भ से ना निकलेंगें नारायण,
जो इंतज़ार हो, इंतज़ार हो.
हमें ही चुनना है अपने पथ को, अंत को,
मिटाने को ये गहन अन्धकार,
ना हो अब सूर्या का इंतज़ार,
अब मशाल लो, मशाल लो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
रूप – रंग का त्याग कर,
रण को प्रस्थान हो.
काम – क्रीड़ा को छोड़कर,
प्रेम से मुख मोड़ कर,
भय पर,
विजय हो, विजय हो.
नर ही नहीं केवल,
नारी के हाथों में भी कृपाण हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
गुरु ही नहीं,
अब माँ से भी अव्वाहन हो.
की पुत्रों को बतायें,
वे वीरों की संतान हैं.
सिंह सा गर्जन करें,
कल अपने संतान फिर,
निर्भीक – निर्भय भविष्य के लिए,
कुशाषकों का,
संहार हो, संहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
परमीत सिंह धुरंधर
भीषण – प्रचंड अग्नि से
धधकते वक्षों पे बुद्ध सी है शांति।
स्वर्ण सा सुशोभित अंगों को
शर्म से हैं बांधती नैनों की पंखुड़ी।
चन्दन से शीतल नितम्बों पे
डोलती – फुफकारती
काले केसूओं की
समृद्ध – गहन कुंडली।
उम्र के पड़ाव पे
वृद्ध भी फिसल रहे.
कामाग्नि में जल कर
तरल बनी है जिंदगी।
पुष्प क्या ? पवन क्या ?
सूर्य, चंद्र, मेघ और नक्षत्र क्या?
कीट और पतंगे भी
डोल – डोल अंगों पे
रसपान कर रहे.
रुत है, रीत है
मन में पुष्पित प्रीत है.
बिन सावन के ही,
नस – नस में तरगों को
नयन उसके सिर्जित और प्रवाहित कर रहें.
धरा क्या? नभ क्या?
अंग – अंग
विश्व को पोषित और संचालित कर रहें।
परमीत सिंह धुरंधर
अंकुर: “भाई, कैसे तुम भाभी के साथ निभा पा रहे हो. मैं तो बोर हो गया हूँ और मेरी बीबी हर समय मुझसे लड़ती रहती है की अब मैं पहले सा नहीं हूँ. उसे प्यार नहीं करता हूँ.”
मैं: “अरे भाई, इसमें इतना चिंता की बात नहीं है. उन्हें हर पल रोमांटिक पल चाहिए, बस दे दिया करो.”
अंकुर: “वो ही तो कहाँ से लाऊँ? घर जाते ही वो मुझे कुछ नहीं करने देती और अपने बातों का पूरा बण्डल ले कर बैठ जाती है.”
फिर मैंने अंकुर को बताया की मैं घर जाते ही रश्मि की आँखों पे पट्टी बाँध के कही बैठा देता हूँ. उसके बाद अपने सारे काम ख़तम कर उसकी पट्टी खोलता हूँ. वो एक दम खुश हो जाती है और कहती है “How Roamntic!”
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कुछ दिन बाद अंकुर फिर मिला, मिलते ही बोला, “भाई सब गड़बड़ हो गया है.”
अंकुर:”मैंने बस एक दिन उसकी आँखों पे पट्टी बाँधा, उसके बाद से मैं जैसे ही घर जाता हूँ, वो ही मेरे आँखों में पट्टी बाँध के जाने घंटों – घंटों क्या करती है?”
मैं:”तो इसमें क्या दिक्कत है? मज़ा तो ले रहे हो ना तुम.”
अंकुर:”अरे नहीं भाई. पहले तो मुझे किसी के मेरे घर में चलने – होने का आभास होता था. अब तो मुझे ऐसा लगता है की कोई रात में मेरे घर में रहता भी है. वो पिछले छह महीने से मेरी आँखों की पट्टी अब वो सुबह में खोलती है.”
मैंने हँसते हुए कहा की भाई तो तुम खुद ही पट्टी खोल लो और देख लो कोई है की नहीं घर में. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ की तुम सुबह तक इंतज़ार क्यों करते हो.
अंकुर:”अरे वो मेरा हाथ – पैर सब बाँध देती है और बिस्तर पे डाल देती है. फिर मुझे छोड़ कर कही चली जाती है और सुबह में मेरी पट्टी खोलती है.”
परमीत सिंह धुरंधर
मीठा और मिठाई से परहेज किसे है?
किसी को भी नहीं।
ये तो बस बीबियों के डर से लोगों ने,
अपने शौक दबा रखे हैं.
हालात कैसे हो जाते हैं शादी के बाद,
कोई हमसे पूछे।
हमने 2018 के स्वागत में लबों की प्यास,
मय से नहीं नींबू – पानी से मिटायें हैं.
परमीत सिंह धुरंधर