बलिदान हो – बलिदान हो – 3


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

है अगर भय तुम्हे,
तो खुद से ही आज पूछ लो.
क्या है वो जिंदगी जिसके?
बेड़ियों में पाँव हों.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो रुक जाये वो धारा नहीं,
जो डूब जाए वो किनारा नहीं।
मानव हो तुम कोई पशु नहीं,
जो दर पे किसी के बंध जाए.
वो पौरष नहीं जिसका,
ना स्तुति, ना कोई गान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो भूल गए इतिहास अपना,
उनका कोई वर्तमान नहीं।
वो क्या मांगेंगे हक़ अपना जालिम से?
जिनको अपने लहू का आभास नहीं।
ये समर है उन वीरों का जिनका,
प्राण से बढ़कर मान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बसंत


आज बसंत-पंचमी पे माँ सरस्वती को समर्पित मेरी बसंत पे पहली रचना।

चोली को संभाल गोरी, चोली को संभाल,
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।
खोल ले बटन राजा, खोल ले बटन,
आ गया है बसंत, डाल ले गुलाल।

डालूंगा गोरी तो फिर छोडूंगा नहीं,
फिर मत कहना लागे है तुझे लाज.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

मूँद लुंगी आँखे तू डाल ले धीरे से,
बस तोड़ ना देना राजा मेरी चोली का बटन.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कौटिल्या – विभीषण – महाभारत : An interesting triangle from Hindu history


अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्जी एक प्यारा सा मामा बन गया


काली – काली आँखों दा इशारा हो गया,
चढ़ती जवानी को एक सहारा मिल गया.
लग गयीं बंदिशें जवानी पे उसके,
दुप्पट्टे को उसके उड़ा के जो कागा ले गया.

जाने क्या है आँखों के लड़ जाने में नशा?
बंद कमरों की सुनी दीवारों में भी,
मिल रही उसको हजारों खुशियाँ।
चर्चा है गली – मोहल्ले में हर कहीं,
अब तो डालनी होगी इसके पैरों में बेड़ियाँ।

तितली सी उड़ती थी जो हर जगह,
अब बैठी है कैद में बुलबुल सी.
लाडो – लाडो कह के बुलाती थी जिसे अम्मा,
अब दूर से ही दे जाती हैं खाना भाभियाँ।

सखियों से संदेसे अब छूट ही गए,
चूड़ियों के रंग कब के ढल भी गए.
अंकुरित स्वप्न जो ह्रदय में मचले थे,
सींचने से पहले ही उठा दी डोलियाँ।

अभी तो दर्जी संग सीखा भी न था,
चोली पे होली में रंग लगवाना
की दो – दो मेरे बच्चों का वो,
एक प्यारा सा मामा बन गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ना कोई सौतन हो


सर्व धर्म समभाव हो,
भारत एक ऐसा गावं हो.
जहाँ एक तरफ गीता
और गुरु ग्रन्थ साहिब जी,
तो एक तरफ बाइबल
और कुरान का पाठ हो.

जहाँ सच्चे को आंच नहीं,
जहाँ दुष्ट को भी कष्ट नहीं।
जहाँ पर धन और पर नारी का,
किसी ह्रदय में लोभ नहीं।
भारत एक ऐसा गावं हो,
जहाँ किसी नारी का आँगन,
तोड़ने के लिए ना कोई सौतन हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों से ब्रह्माण्ड तक


मैं क्या जाम उठाऊं अपने हाथों से?
निगाहें इस कदर तेरे वक्षों पे जम गयी हैं.
इरादे कैसे बदल जाते हैं जीवन में?
मेरी ये धड़कने स्वयं आज जान गयी हैं.
अगर विष को धारण किये विषधर है ये,
तो भी मेरे अधरों पे एक प्यास जग गयी है.
या तो हर ले मेरे समस्त जीवन को,
इन वक्षों पे सुला के?
या नीलकंठ सा झूम लेने दे,
क्यों की ये सिर्फ वक्ष नहीं,
मेरा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बन गयी हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब तो दर्जी भी मेरा ना रहा


मेरी सखिया सब, अब कुँवारी ना रहीं,
बस एक मेरा ही निकाह अब तक न हुआ.
कैसे मिलूं रोज – रोज तुमसे यूँ चोरी – चोरी, छुपके?
की अब तो दर्जी भी मेरा ना रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लाल रंग


हालात कहाँ बदल रहें, ना तुम इन्हें बदलने दोगे।
इतने करीब आके भी एक दूरी तुम हमसे रख ही लोगे।

ना रखा करो लाल रंग कपड़ों का अपने जिस्म पे,
कहीं भोरें गुलाब समझ कर ना तुमसे लिपटने लगें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माई हमके बड़ी सुनाई


हमरा खटिया, हमरा खटिया,
हमरा खटिया पे ए राजा जी,
ऐसे ना जोड़ लगाईं।
टूट जाइ एकर पाया त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

रउरा खातिर देखि का – का करSतानी ,
मिलSतानी रोजे चोरा के,
आ केवाड़ रखSतानी खोली के.
हमरा अंगना में ए राजा जी,
ऐसे ना रात बिताईं।
चूड़ी जे जाइ खनक त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

कहS तानी रउरा से,
की जल्दी से शादी कर लीं हाँ.
ना त छोड़ीं हमार पीछा,
हमरो के अब बसे दीं हाँ.
हमरा जोबना, हमरा जोबना,
हमरा जोबना के ए राजा जी,
ऐसे मत बढ़ाईं।
दरजी कर दी शिकायत त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलिदान हो – बलिदान हो – 2


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

धरती को रंग दो ऐसे,
की कण – कण इसका लाल हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

वीरों की संतान हो,
ऐसा संग्राम तुम करो.
की गूंज हो हिमालय तक,
और आसमा तक शंखनाद हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

विजय की नहीं कामना,
अब मन में है.
धर्म की स्थापना,
ना अब अपना लक्ष्य ही है.
अब तो बस केवल,
रण-चंडी का आव्हाहन हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

अभेद किसका दुर्ग रहा,
जो भय अपने मन में हो.
विजय किसकी रही शास्वत,
जो अंत अपना बस पराजय में हो.
अपने लहू से लिख दो ऐसा इतिहास,
की पीढ़ियों को अभिमान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जीवन का मोह त्याग कर,
साथ चले इस राह पर.
चाहे हिन्दू हों, या मुसलमान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर