जो अपनी माँ से प्यार नहीं करते,
वो अपने बच्चों की माँ से प्यार कैसे करेंगें?
और जो अपने बच्चों की माँ से प्यार नहीं करते,
वो क्या अपनी माँ को प्यार करेंगे?
परमीत सिंह धुरंधर
जो अपनी माँ से प्यार नहीं करते,
वो अपने बच्चों की माँ से प्यार कैसे करेंगें?
और जो अपने बच्चों की माँ से प्यार नहीं करते,
वो क्या अपनी माँ को प्यार करेंगे?
परमीत सिंह धुरंधर
नशा आँखों से होता है,
पर उसका एहसास जिस्म को होता है.
तुम चाहे जितनी दूर हो,
पर हर एक पल में साँसों को तुम्हारा एहसास है.
परमीत सिंह धुरंधर
इरादा मुझसे पूछता है जहाँ,
जिसे पता ही नहीं मेरा लहू कब इश्क़ बन गया?
अब किसकी खता कहूं इसे?
तेरी नजरों को ज़माने की शोहरत,
और मेरी नज़रों को तेरी नजर का तीर मार गया.
परमीत सिंह धुरंधर
नज़ारे कितने गुजर गए इन आँखों के सामने से,
जो ना गुजरा वो अब तक तेरा चेहरा है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुझे यूँ ही अपनी साँसों का समुन्दर देता रहूँगा,
तू उछल तो एक लहार बन कर,
तुझे अपने किनारों की सारी जमीन दे दूंगा।
परमीत सिंह धुरंधर
जिन्दा रहने के लिए,
एक मुलाकात जरुरी है सनम.
जरुरी है सनम.
तेरी इस झुकी नजर के लिए,
मेरा पास आना जरुरी है सनम.
जरुरी है सनम.
जब बिखरती हैं जुल्फें, तेरे चेहरे पे,
बढ़ जाती हैं तेरी साँसे।
इन साँसों की मंजिल के लिए,
मेरी साँसों का उठाना जरुरी है सनम.
जरुरी है सनम.
तकिए पे कब तक करवट लोगी?
मीठी नींद के लिए,
एक चुम्बन जरुरी है सनम.
जरुरी है सनम.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम अदृश्य होता है,
पर, दृश्यों को बदल देता है.
जिन्हे नहीं पता,
पेड़ – पौधों की प्रजातियां।
फूल – पत्तियों को किताबों में,
वो भी संजोते हैं.
मदिरा दृश्य है,
पर, सबको अदृश्य कर देता है.
जिन्हे नहीं पता,
अक्षरों का, उनके मूल्यों का.
वो भी, मंदिरों में, समाज में,
मेले में, अमूल्य प्रवचन देते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
वो इतने करीब से निकल गई,
अंजान बनके।
मोहब्बत थी, बरना चुनर उड़ा लेते,
हैवान बनके।
अब इशारों -इशारों में रह गई जिंदगी,
सुखी, उदास, गुलाब की पंखुड़ियों सी,
किताबों में बंध के.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हे इतने प्यार से रखूँगा समेट के,
की तुम करवट भी लोगी तो, मेरे बाहों में.
मेरी ओठों से तुम्हारी ओठों का न होगा फासला,
तुम साँसे भी लोगों तो मेरी साँसों से.
परमीत सिंह धुरंधर
जमाना आज भी कहता है,
की वो खूबसूरत बहुत हैं.
किसी को क्या पता?
उनके काजल से काले,
हम हो गए.
परमीत सिंह धुरंधर