कुत्ते दौड़ते हुए गलियों में,
उनका रूप चुराने को.
अम्बर पे चाँद हंस रहा,
देख अपने दीवानों को.
कुत्तों की किस्मत में नहीं,
चाँद से अपने मिल पाना।
ना चाँद के भाग्य में है,
इन कुत्तों जैसा कोई दीवाना।
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
कुत्ते दौड़ते हुए गलियों में,
उनका रूप चुराने को.
अम्बर पे चाँद हंस रहा,
देख अपने दीवानों को.
कुत्तों की किस्मत में नहीं,
चाँद से अपने मिल पाना।
ना चाँद के भाग्य में है,
इन कुत्तों जैसा कोई दीवाना।
परमीत सिंह धुरंधर
स्त्री को प्रेम जवानी में और मर्द को बुढ़ापे में होता है. एक को हमने चरित्रहीनता तो दूसरे को वासना का नाम दे दिया है, जबकि प्रेम की और दूसरी अवस्था सिर्फ और सिर्फ दोनों की मज़बूरी है. उसे रोकने के लिए हम वफ़ा, इज्जत, और समाज की दुहाई देते हैं और हमें रोकने के लिए वो उम्र, परिवार, और अपने बच्चों की दुहाई।
परमीत सिंह धुरंधर
धरती बेचैन हैं,
बादल बेताब है.
ऐसी है मोहब्बत,
की दोनों बेलगाम हैं.
वो बरसता हैं उमड़-उमड़ के,
वो लहराती हैं मचल-मचल के.
दोनों के बीच है दूरी, लाख योजन की,
पर रिश्ता ये बेमिसाल है.
जब पतझड़ आता हैं,
सब कुछ हर जाता है.
अपने योवन में मस्त बैल,
दौड़ – दौड़ के,
सुनी धरती को सजाता हैं.
तो कोना – कोना धरती का,
सोना बनके लहलहाता हैं.
अनपढ़ – गवार, भारत का किसान,
जिसकी मुठ्ठी में, भूख और प्यास है.
जब हल लिए काँधे पे,
खेतो में जाता है,
तो सावन छा जाता है.
इठलाती है धरती दुल्हन सी,
और खेत – खलिहान भर जाता है.
ऐसी है मोहब्बत,
रिश्ता ये बेमिसाल है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो मुस्कायीं,
मेरी जवानी देख कर.
फिर मेरी मैय्यत पे ही,
आकर मुस्कायीं।
ऐसी मोहब्बत थी हम में,
की वो कभी,
फिर, मेरे घर नहीं आई.
उन्हें अपनी माँ से ज्यादा,
मेरी माँ पसंद थी.
आखिरी क्षणों तक,
मुझे कहाँ खबर थी,
की अपनी माँ की खुशियों के लिए,
वो मेरी माँ को रुला गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
रिश्ते सुधर लो,
कब तक यूँ उनसे उलझते रहोगे?
क्या, इरादा है?
कब तक यूँ इन गलियों में भटकते रहोगे?
दिन तो कट ही जायेगी,
कहीं किसी के दूकान पे,
चाय का सवाद ले कर.
किसी घने वृक्ष के नीचे,
तन डाल कर.
सोचों, रातों का क्या करोगे?
कब तक यूँ अंधेरों में,
दिया जलाओगे?
(I would prefer to live with you,
to a life with a new.
With all pain and happiness,
would prefer to be with you.)
परमीत सिंह धुरंधर
तुम क्या समझोगे मेरी असमंजस को,
हर सितम में बस तुम्हारी ही तमन्ना है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो शाम सी ढली,
और खो गयी,
रात के अंधेरो में,
की हम फिर मिल न सके.
उसे जिद्द था मुझसे दूर जाने की,
मुझे गुरुर था उसके निगाहों की,
उसकी मोहब्बत में,
बनकर तारा यूँ मैं टूटा,
की फिर कभी ये जुदाई मिट न सकी.
परमीत सिंह धुरंधर
इन काली-काली आँखों में,
मैं काजल बनके बस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ चंदा-तारें ले आऊँ.
कभी बादल बनके बिचरूँ,
इन उड़ती-उड़ती तेरी जुल्फों में.
फिर कभी छम-छम करके बरसूँ,
तेरे उन्नत-उन्नत बक्षों पे.
तेरी गोरी-गोरी काया पे,
चन्दन सा मैं घिस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ हल्दी-उबटन लगाऊँ।
परमीत सिंह धुरंधर
आज जब रोता हूँ तो आँसूं नहीं निकलते हैं.
जब आँसूं निकल रहा था, मैं रो नहीं रहा था.
परमीत सिंह धुरंधर
The girl with the newspaper,
took my heart forever.
In the moving train,
first time,
I felt the heart-pain.
That night, I dreamed a lot,
because, she was so hot.
With black eyes,
and long hair,
took my heart forever.
The girl with the newspaper,
took my heart forever.
Parmit Singh Dhurandhar