बिंदिया


उसका नाम था बिंदिया,
सावलें बदन पे,
रखती थी जो दो चंचल अँखियाँ।
कैसे ना डूबता,
उसके प्यार के सागर में,
एक ही मुस्कान से उदा देती थी,
जो रातों की निंदिया।
अच्छे पल थे,
सुनहरे कल के सपनों में।
मुझे क्या पता था की,
मेरी जल जायेगी दुनिया।
इल्जाम मुझपे ही आये सारे,
कुछ पल मैं भी,
गम और शिकायत में जिया।
मगर, यहाँ से अब न शिकायत है,
न कोई कोसिस।
बस याद आती है,
उनकी वो बेवफाई,
और उनकी मीठी बतिया।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ इतना भी न कीजिये,
की उनके रहमो-करम पे हों साँसें।
दिल जलता है तो जल जाए,
हमें नहीं चाहिए वैसी रातें।

परमीत सिंह धुरंधर

हुजूर


मुझसे मत पूछो इन आँखों का कुसूर,
शहंशाह तो मैं ही आज भी, पर वे हैं मेरे हुजूर।
जुल्म भी उनकी और हम उफ़ तक न करे,
खिदमत भी उनकी और वो खुश न रहें,
की मोहब्बत का बस एहि है दस्तूर।

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


मेरी धमनिकाओं में रक्त प्रवाहित है,
तुम्हारी साँसों की चाहत में.
और मेरी साँसों में स्पंदन प्रज्जवलित है,
सिर्फ तुम्हारी धमनिकाओं की आहट से.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीब


इतना गरीब हूँ मैं,
इतना गरीब हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मैं बेबस हूँ, लाचार,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
सोच-सोच के आती है नींदे,
और ओस की बूंदों सी उड़ जाती है।
लेटे-लेटे चारपाई पे मैं,
बस तारे गिनता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
बस पानी पीता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
वो ढूंढे सोना -चांदी,
मेरे तन पे कपड़े नहीं।
उनके आँखों में हज़ार सपने,
मेरा कोई ठौर नहीं।
वो रातों को भी हंसती हैं।
मैं दिन में भी शांत बैठता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
पुवाल पे सोता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

महफ़िल


अब मैं महफ़िल में नहीं,
मयखानों में बैठा हूँ,
महफ़िल की शान तो वो हैं,
जिनकी यादो का ये जाम,
मैं उठाये बैठा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


ये दर्द जो तेरे दिल में है,
इसे कही, दबा दे, दफना दे,
मिटा दे, कुछ कर दे,
या तो जला दे.
इसे किसी को बताने में क्या रखा है.
और जब उन्हें ही नहीं है,
तेरे दर्द से वास्ता,
तो फिर किसी और से,
उम्मीद क्यों लगा के रखा है.
बहुत गिरे हैं इस राहे-मंजिल में,
मेरी मान मेरे दोस्त,
उनके बिकने से,
तेरा गिरते रहना है अच्छा है.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


आँखों में माया रखती हैं,
ह्रदय में छलावा रखती हैं.
तुम कहते हो प्रेम उसे,
वो तो दिखावा करती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

श्रृंगार


वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.
इश्क़ हो ना हो मुझे उनसे,
मगर वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं.
ये सच है की हमारा मिलन,
परिवार वालों ने कराया था.
मगर अब वो जन्मो की,
जानी-पहचाननी सी लगती हैं.
मुझे कहाँ याद आती है उनकी,
दोस्तों की भीड़ में.
मगर सहेलियों के बीच,
वो मेरा ही चर्चा चलाती हैं.
दिन में कहाँ फुर्सत है उनको,
की पास आके मेरे बैठें.
वो तो बस छू कर ही,
अपना हाले-दिल सुनाती हैं.
मैं तो चिल्लाते रहता हूँ,
हर घडी, उनका नाम,
एक पल जो ना सुनाई दूँ उनको,
तो दौड़ी-दौड़ी चली आती हैं.
वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

तितली


मशहूर था जब मैं तब वो,
एक तितली बन कर आयीं।
मेरे उपवन के पुष्पों पे,
पंखों को फैला के मण्डराई।
जब युद्ध छिड़ा मेरा सावन से,
सूरज ने जोर लगाई।
जब सूखने लगे फूल मेरे,
बादलों ने ना अपनी बूंदें बरसाई।
तब वो तितली ने कही और जाकर,
दूसरे उपवन में घर बसाई।

परमीत सिंह धुरंधर