आखरी तमन्ना


उम्र भर की मुझे दुआ देने वालो,
अपनी दुआओं में उनका नाम रख दो.
मेरा हर दुकुं वो ही है वो ही,
मेरी इस जमीन पे वो एक माटी रख दो.
टूटने से पहले बिछुड़ना पड़ता हैं,
सबकी ख़ुशी में गम सहना पड़ता है.
उनकी नजर है इबादत मेरी,
मेरे जनाजे पे वो एक तस्वीर रख दो.
तरसता रहा हूँ साड़ी जिंदगी,
ये प्यास होंठो पर रख कर.
आँखे तो अब न देख पाएंगी उन्हें,
काम-से-काम, चेहरे पे वो आँचल रख दो.
उम्र भर की मुझे दुआ देने वालो,
अपनी दुआओं में उनका नाम रख दो.

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब मुझसे मत पूछ मेरा शौक तू,
ये ही तो दुःख है की आज भी मेरा शौक तू.
कोई गिला नहीं तेरी इस माशूमियत से,
हर बार हाल दिल पूछ कर बन जाता है अनजान तू.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत II


अपनी किस्मत ही इस कदर थी रूठी,
सारी उम्र गुजर गई आँखों में बसकर।
जो जुदा हुए उनकी पलकों से,
उनकों देखा नाचते हुए उनकी वक्षों पे थिरक कर.

परमीत सिंह धुरंधर

बीमार


उनकी दवा की दूकान है,
और वो दिल का इलाज करती हैं.
इसलिए मैं बीमार रहता हूँ, की
वो मेरे सीने पे स्टेथोस्कोप,
और नब्ज पे हाथ रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

तू बोल सोनिये II


रोटी पकाना छोड़ दूँ,
चूल्हा जलाना छोड़ दूँ,
आँगन बहारना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सास की सुनना छोड़ दूँ,
देवर का मानना छोड़ दूँ,
ननद संग खेलना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
गोबर निकालना छोड़ दूँ,
चिपरी पाथना छोड़ दूँ,
लेगी लगाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सुबह में उठना छोड़ दूँ,
साज-सवारना छोड़ दूँ,
पास तेरे आना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
पास-पड़ोस छोड़ दूँ,
चौकी-चूल्हा छोड़ दूँ,
घर-आँगन छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
दीप जलाना छोड़ दूँ,
पूजा-पाठ छोड़ दूँ,
सखी-सहेली छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.

परमीत सिंह धुरंधर

तू बोल सोनिये


सीवान जाना छोड़ दूँ,
छपरा में बैठना छोड़ दूँ,
मलमलिया, रुकना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत में सोना छोड़ दूँ,
भैंसों को चराना छोड़ दूँ,
पोखर में नहाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
बीज डालना छोड़ दूँ,
फसल पटाना छोड़ दूँ,
नहर बांधना छोड़ दूँ ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत-खलिहान छोड़ दूँ,
दोस्त-ज्वार छोड़ दूँ,
साली -सरहज छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
ताश खेलना छोड़ दूँ,
बाजी लगाना छोड़ दूँ,
भौजी के घर जाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
होली की मस्ती छोड़ दूँ,
गावं की गोरी, छोड़ दूँ,
नयन-मटक्का छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।

परमीत सिंह धुरंधर

गुलाब


रिश्ते टूट कर भी,
चमक रखते हैं,
माँ कितनी भी दूर हो,
उसकी दुवाओं में बस हम बसते हैं.
लूट गयी उनकी नज़र,
बड़ी ख़ामोशी से,
लेकिन शहर वाली की नज़र में,
हम लुटेरे दीखते हैं.
सब पूछते हैं की भूल क्यों नहीं जाता,
अब क्या कहें की, गुलाब की पंखुड़िया भी,
उनके अधरों से डोलतें हैं.
अब तो ख़्वाबों में भी रुक गया हैं आना-जाना,
किस्मत बदलने पे अपने भी पराये लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार


दिल, तोड़ कर, जा रहे हो जो तुम,
याद आएंगे बहुत, ये छुपा रहे हो तुम.
चंद लम्हों की ये मुलाकात नहीं,
जन्मो का प्यार ठुकरा रहे हो तुम.
मिट तो हम जाएंगे यूँ ही रो-रोकर,
चैन मिल न पायेगा तुम्हे, ये जानते हो तुम.

परमीत सिंह धुरंधर

दास्ताँ


ये माना की,
मोहब्बत की हर दास्ताँ पे तेरा नाम होगा,
पर ये तो बता,
उनकी लबों पे किसका नाम होगा।
तू जो इतना कर रहा है उनकी खातिर,
ये तो बता,
उनकी दास्तानों पे किस- किस का निशान होगा।

परमीत सिंह धुरंधर

उलझन


उलझने उनकी सुलझाने से वो तेरी नहीं हो सकती,
उनको बनाने के बाद तो खुदा भी उलझा- उलझा रहता है.

परमीत सिंह धुरंधर