अजी आप थीं,
बगल में, इसलिए,
मैं भूखा ही रह गया,
खाली जाम ओठों से,
लगा के.
अजी आप थीं,
बगल में, इसलिए,
मैं सोता ही रह गया,
खुली आँखों से,
सपने सजाते- सजाते।
एक बार ही सही,
आपने रखा जो हाथ,
मेरे सीने पे,
हर लम्हा जी गया परमीत,
बस यूँ ही पास आते-आते.
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प्रयास
उल-जुलूल,
हरकते,
अब बंद कर
ए दिल,
कब चाँद धरती पे,
आने वाला हैं.
प्रयास ही करना है,
तो, नहर बनाने में कर,
कब तेरी फसलों को,
सागर आके सींचने वाला है.
कलियाँ जो खिल नहीं सकती
बागों में तेरे,
उनके लिए, अपनी जमीं को,
न छोड़, परमीत
की कब कलियों से,
बचपन पलने वाला हैं.
हुस्न
जो रातों में मिलता है,
इतना करीब आके,
वो दिन के निकलते ही,
इतना अनजान क्यों है.
पिघलता है जो वर्फ सा,
शाम के ढलते ही,
वो सूरज की किरणों के,
आते ही,
यूँ पत्थर सा क्यों है.
कहते हैं सब,
नाजुक होता है दिल,
आँचल में रहने वालों का,
फिर,
दूसरों के दर्द पे,
वो परमीत,
इतना मुस्कराता क्यों है.
हिंदुस्तान- पाकिस्तान
तलाश,
आज खत्म हुई,
ए दिल,
जब देखा,
उनका चेहरा।
मगर एहसास,
हुआ,
मज़बूरी का,
सिसकते जज्बातों का,
की कह भी,
नहीं सकते उनको,
हम अपना।
सुकून-दर्द का,
एक रिश्ता है,
जो साथ-साथ,
बहता रहता है,
एक हाथ के,
फासले पे भी,
हिंदुस्तान- पाकिस्तान में,
मीलों का,
फासला हैं, परमीत।
लाहौर के बादल
वो लाहौर की हैं,
या फिर कराची से,
दिल कहता है,
की कोई रिश्ता है,
उनका मेरे काशी से.
आँखों में वही,
काजल हैं,
जो उड़ता है,
धुंवा बनके,
अब भी मेरे,
गाछी में.
एक नजर से ही,
वो अपने,
सोंख गयीं,
दिल में उठती,
गंगा की हर,
धारा को.
बादल उठें है ये,
पेशावर से,
या बलूचिस्तान से,
पर बरस रहे हैं, परमीत,
ये तेरे,
दिले-हिंदुस्तान पे.
त्रिया-चरित्र
घर दुआर छोड़ के,
हो गईलन सन्यासी,
फ़लेनवा के नाती हो,
फ़लेनवा के नाती।
सुनलेरनी उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
बड़ों-बड़ों के बीच में,
करस तहार बखान हों,
देखअ उनकर बिकअता,
खेत आ खलिआन हों।
दबी जुबान में हर कोई कहे,
की उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
छीन के आपने,
मेहरारून के पैजनियाँ,
बाँध देहलन तहके,
बनइलन दुल्हनियां।
की ओइसन,
राज कुमार से,
एगो सुकुमार से,
तुहुँ मंगवैलू,
भीख के दाना हो।
सुनलेरनी उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
कतना लिखान भइल,
कतना पुराण भइल,
कोई न समझल,
ई त्रिया-चरित्र हो।
की कहतारन बाबू,
ईह परमीत सिंह,
की हम न करेम,
तहसे रानी ई प्रीत हो।
सुनलेरनी ताहर,
भीरल रहल टंका,
उनकरे से रानी हो,
उनकरे से रानी।
दिल्ली में बिल्ली
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
मैंने खिलाया उसे भर पेट दूध-भात,
खुद ही काटी खली पेट जारी की रात.
पर वो भी निकली कमबख्त बदजात,
मुझ गरीब आशिक को ही लात मार गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
कितना हम में था प्यार भरा,
कितनी रातों को हमने साथ काटा.
देख के एक मोटा-ताजा बिलाड़,
सब कुछ एक पल में सब भुला गयी,
मुझ गरीब आशिक़ पे ही आँखे अपनी तान गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
बेवफा
प्यार बिकता है इतना भी,
मैंने जाना न था हाँ कभी,
वो साड़ी में थीं मेरे,
पहने पायल किसी और की.
जिनकी तस्वीर सजाता था,
दीवारों पे अपने,
वो बाहों में थी मेरे, परमीत
सपने सजायें किसी और की.
एक लड़की का भोला दिल
एक लड़की का भोला दिल,
बोला,
एक शाम को,
खेलोगे क्या मेरे साथ,
छत्री फूटबाल,
एक शाम को.
शातिर है , शैतान है छत्री ,
आँखों में एक चमक आ गयी,
बोला,
खेलूँगा, मगर
सिर्फ मैं रात को.
विनती हुई, गुहार हुई,
छत्री के चरणों में गिरी,
एक हसीना ने प्रेम-गुहार की.
मुकाबला हुआ,
एक भोली लड़की का एक शैतान से,
शुभारम्भ हुआ , हंग्कोक पे ,
मीठे-मीठे दो जाम से.
पसीने-पसीने हो गयी ,
एक सीधी सी लड़की,
निष्ठुर है, चालक है छत्री ,
खूब छकाया, उसे
एक रात को……Crassa