रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं


रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं,
जब से हम अपनी दुल्हन के संग हो गए हैं.
मौलवी-पंडित, सब परेशान हो गए हैं.
जब से हम अपनी बीबी संग खुलेआम हो गए हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलवट – लोढ़ा


तू गावं की छोरी, मैं शहर का छोरा,
आज खेले हम सिलवट – लोढ़ा।
तू डाल दे हल्दी, मैं मार दूँ हथोड़ा,
रंग खिलेगा तब चोखा – चोखा।
खेत हैं तेरे सारे धान वाले,
उसमे उपजा रहा है गेहूं, बाप तेरा,
अकल है जिसमे बस थोड़ा – थोड़ा।
नयन तेरे हैं सागर से,
मैं भीं उसमे एक पल बिता लूँ.
समझा दे अपने घरवालों को,
ना छेड़ें इसको,
वरना नासूर बन जाएगा ये फोड़ा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है


कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,
मैं सीमा का प्रहरी और तू आँगन की एक कलि है.
मैं अपने स्वार्थ वस बंधा हूँ तुझसे,
तू निस्वार्थ मन से मेरे संग कष्ट उठाती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है.
तुमने काटी हस कर बरसों एक ही साड़ी में,
और लाने को नयी पोशाकें मेरे लिए,
होली में, मेरी हाथों को पैसे थमाती है.
मैं नहीं दे पाया तुम्हे कभी भो कोई खुशियाँ,
मगर तू जिन्दी के इस साँझ पे भी,
मेरी हर खुसी पे मुस्काती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,

परमीत सिंह धुरंधर

नैहर के खेल हो


हमारा से सैया जी पुछि मत नैहर के खेल हो,
माई कहत रहली बाबुल से एक रात,
की ई लड़की त हाथ से गईल निकल हो.
गऊअन के पंडित – मुल्ला, भड़स हमर पानी,
आ दर्जिया त सिये चोलिया बिना लेले मोल हो.
हमारा से सैया जी पुछि मत नैहर के हमर चाल हो,
रोजे नापी खेता – खेती, चौरा – चौरी, एक सांस में,
अइसन रखले रहनी अहिरन के छोरा संग मेल हो.
बहिना कहलस माई से एक रात हो,
की ए माई, दिदिया त आपन बारी बड़ी बिगड़ैल हो.

परमीत सिंह धुरंधर

हाँ -पे-हाँ कहलवाया है


सारी रात,
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.
टूटी एक – एक कर,
टूटी एक – एक कर चूड़ी कलाई में,
निर्मोही ने ऐसे नचाया है.
ना सोई,
ना सोई न ही करवट बदल पाई,
बस हर घड़ी हाँ -पे-हाँ कहलवाया है.
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.

परमीत सिंह धुरंधर

पत्नी


गले – से – गले मिलके,
तुमने संभाला है ओठों को.
वरना हम तो बहक ही चुके थे,
देख, शहर में मयखाने को.
मिलती है अनगिनित परियाँ,
रोज, मेरी रात बसाने को.
तुम ना होते तो बिक ही जाते,
आँचल उनका सजाने को.
कई साल बीते, यूँ ही,
एक ही साड़ी पहने- पहनते.
और हर मास, मुझे नया,
सूट तुम सिलवाती हो.
ये तुम ही हो जिसने बचाईं है,
दीवारें मेरे घर की.
पर दुनिया भर में कहती हो,
नाम मेरा, अहम मेरा बचाने को.
बाहों – में – बाहें डालकर,
तुमने ही बचाया है जीवन को.
वरना हम तो मिट चुके थे,
कब का, खाते – खाते राहों में ठोकरों को.

परमीत सिंह धुरंधर

धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें


जब तुम खामोश हो जाती हो,
मेरी बाहों में आकर।
हर थकान मिट जाती है,
तुम्हारी साँसों को छूकर।
यूँ ही गुजरती रहें रातें,
बिना कुछ कहे – सुने।
बस तेरी झुकी पलकें हों,
और मेरी गर्म साँसे।
मुद्दत तक हो यूँ ही बरसात,
की डूब जाए हर खेत और खलिहान।
यूँ ही सुलगती रहे, ये आग चूल्हे की,
न रोटी पके और न जले,
बस धुंओं से धुंधला, तेरा जिस्म हो,
और धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें।

परमीत सिंह धुरंधर

तू बोल सोनिये II


रोटी पकाना छोड़ दूँ,
चूल्हा जलाना छोड़ दूँ,
आँगन बहारना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सास की सुनना छोड़ दूँ,
देवर का मानना छोड़ दूँ,
ननद संग खेलना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
गोबर निकालना छोड़ दूँ,
चिपरी पाथना छोड़ दूँ,
लेगी लगाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सुबह में उठना छोड़ दूँ,
साज-सवारना छोड़ दूँ,
पास तेरे आना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
पास-पड़ोस छोड़ दूँ,
चौकी-चूल्हा छोड़ दूँ,
घर-आँगन छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
दीप जलाना छोड़ दूँ,
पूजा-पाठ छोड़ दूँ,
सखी-सहेली छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.

परमीत सिंह धुरंधर

तू बोल सोनिये


सीवान जाना छोड़ दूँ,
छपरा में बैठना छोड़ दूँ,
मलमलिया, रुकना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत में सोना छोड़ दूँ,
भैंसों को चराना छोड़ दूँ,
पोखर में नहाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
बीज डालना छोड़ दूँ,
फसल पटाना छोड़ दूँ,
नहर बांधना छोड़ दूँ ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत-खलिहान छोड़ दूँ,
दोस्त-ज्वार छोड़ दूँ,
साली -सरहज छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
ताश खेलना छोड़ दूँ,
बाजी लगाना छोड़ दूँ,
भौजी के घर जाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
होली की मस्ती छोड़ दूँ,
गावं की गोरी, छोड़ दूँ,
नयन-मटक्का छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।

परमीत सिंह धुरंधर

नथुनिया दिलाई ना


तानी दूर-दूर से ए बालम धुरंधर जी,
नयनन में प्यार जगाई ना,
खेत कहीं नइखे भागल जात,
कहियो आँगन में खाट बिछाई ना.
कब तक बहेम खुदे बैल नियर,
कभी हमके भी छपरा घुमाई ना.
चूल्हा-काठी करत, हमार कमर टूट गइल,
गेहूं-धान बोआत, राउर उम्र हो गइल,
कब तक करेम इह दुनियादारी,
कभी गंगा में भी संगे नहाईं ना.
अरे बबलू बो, गुड्डू बो के, देख के जियरा जले,
एगो बालम के कमाई पे, रोजे सजाव दही कटे,
दौलत बचा के का होइ,
कभी एगो नथुनिया, हमें दिलाई ना.