छपरा की बैठकी


मुझे छोड़ गए बलमा
एक प्यास जगाकर।
सुलगती रही सारी रात
मैं एक आस लगाकर।

काजल भी न बहा
न टुटा ही गजरा।
उड़ गया वो भौंरा
अपनी जात बताकर।

कोई संदेसा पीठा दो
उस हरजाई Crassa को.
न ऐसे छले
हाय, दिल लगाकर।

जाने क्या मिलता है
छपरा की बैठकी में.
की भूल गए तुम हमें
अपनी लुगाई बनाकर।

परमीत सिंह धुरंधर

दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

न करे खर्च एक रुपया


काला – काला सैया मेरा
जैसे कोई कउआ.
दिन भर करे टर्र – टर्र
रात में चढ़ा के पउआ.

दुःख का पहाड़ टूटा है सखी
जाने क्या देख, बाबुल बाँध गए पल्ला?
मेरी भारी जवानी पे
न करे खर्च एक रुपया।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे


उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.

कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उस लड़की के वक्षों पे


यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लाड़ली


बाबुल तुझसे दूर जा रही है,
तेरी लाड़ली अनजान बनके।
नए धागों में ही बांधना था,
तो क्यों संभाला था दिल में?
अपनी जान बोलके।
मैं हंसती थी, तो तुम हँसते थे.
मैं रोती थी, तो तुम रोते थे.
रिश्ता था अगर वो सच्चा,
तो क्यों बाँट दिया आँगन?
मुझे अपना सौभाग्य बोलके।
अब किससे दिवाली पे तकरार होगी?
रूठ कर किसपे प्रहार करुँगी?
याद आवोगे जब इन आंशुओं में,
तो किसके सीने से दौड़ के लगूंगी?
अगर मैं हूँ खून तुम्हारा,
तो क्यों सौंप रहे हो गैरों को?
अपनी शान बोलके।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मठ्ठा सैंया


काट ल दही परके छाली सैंया,
ना त महला पे मिली मठ्ठा सैंया।
छोड़ द सबके दुआर अगोरल,
भूल जा राति के बथानी में पसरल।
लूट जाइ थाती त बस बाची टूटल ठाटी सैंया।

 

परमीत सिंह धुरंधर