सैया


सैया देलन एगो गुलाब अंखिया से अंखिया लड़ाके,
फिर त अ सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके जाके।
सखी कैसे कहीं सब बात, सब लूटा देहनी होश गवां के।
ना मैं कुछ बोल पायी, ना आँखे खोल पायी,
भाया तो मुझे कुछ नहीं पर ना मैं परमीत को रोक पायी।
सैया पहनाने लगे चूड़ी अंखिया में अंखिया डाल के,
फिर सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके समा के।

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