खर्चा उठा ली


सारी नगरिया में चर्चा बा रउरे आमदनी के
सुनी ए बाबूसाहेब छपरा के धुरंधर
खर्चा उठा ली हमर जवनिया के.

हमरा खूंटा से कउनो गाय ना तुराईल आज तक
फंस जइबू रानी, रहे के पड़ी
साड़ी उम्र फिर संगे कोठारिया में.

परमीत सिंह धुरंधर

उसी के संग अब बिछाऊँ गी खटिया


पतली कमर पे जवानी का नशा
ढूंढ रहीं हूँ गली – गली में पिया।
सूना है कोई है छपरा का धुरंधर
सखी
उसी के संग अब बिछाऊँ गी खटिया।

कैसे पड़ गयी तू उसके हथकंडे?
निर्दयी, निर्मोही, वो तो है शातिर बड़ा.
तू जल रही है शायद
आफताब ने कहा की वो है भोला बड़ा.
कैसे पड़ गयी तू इन दोनों के हथकंडे?
दोनों की यारी, है दांत-कटी यहाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला


जब – जब कोयलिया कुहके बाग़ में
मन में हुक उठे ला.

दू गो हमार नैना राजा जी
विरह में पोखर पे सांझ ढले ला.

छोड़ दी शहर के कमाई
चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला.

परमीत सिंह धुरंधर

दू ए गो नथुनिया


दू ए गो नथुनिया में लूट अ तारअ राजा
रात में चैन आ दिन में मजा.

कइला बदनाम, भइल सारा जिला में हल्ला
बाली उमर में ही दे दिहलअ साजा।

छुप के – छुपा के आवतानी तहरा से मिले
ओपर तू रखअतार किवाड़ खुला।

 

परमीत सिंह धुरंधर

किवाड़ खुला राजा जी


अभी बाली बा उमर राजा जी
काहे दे तानी हमके अइसन सजा राजा जी.
रोजे आवेनी छुप के – छुपा के सबसे
आ रउरा रखsतानी किवाड़ खुला राजा जी.
हमरा पे मत ऐसे जुल्म बढ़ाई राजा जी
ना त हम हो जाएम बदनाम बड़ा राजा जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खोलीं किवाड़ के


तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
जागल होईअन सास अभी
दे वे लागियन आवाज रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

सगरो से दुखाता
सारा ई देहिया।
अब जे उठेंम
त चढ़ जाई बुखार रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

बाटे रउरा से प्यार बहुत
ना त टिकती ना इ सुखल – ससुरा में.
मुँह बंद करके धीरे – धीरे सैया
चढ़ी खटिया पे.
बाबू जी ढूढ़तारन सुबहे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तनी देखि ना पतरा पंडित जी


बड़ी भारी भइल बा जोवन
कर अ ता बड़ी जुलम।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

चढ़ल जाता इ उम्र
सूना – सूना जाता हर सावन।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

सारी सखियाँ भइली लरकोरी
झुल अ तारी भरके गोदी
ललचे रहल – रहल हमरो मन.
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

 

परमीत सिंह धुरंधर