गुलाब


रिश्ते टूट कर भी,
चमक रखते हैं,
माँ कितनी भी दूर हो,
उसकी दुवाओं में बस हम बसते हैं.
लूट गयी उनकी नज़र,
बड़ी ख़ामोशी से,
लेकिन शहर वाली की नज़र में,
हम लुटेरे दीखते हैं.
सब पूछते हैं की भूल क्यों नहीं जाता,
अब क्या कहें की, गुलाब की पंखुड़िया भी,
उनके अधरों से डोलतें हैं.
अब तो ख़्वाबों में भी रुक गया हैं आना-जाना,
किस्मत बदलने पे अपने भी पराये लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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