ये दर्द जो तेरे दिल में है,
इसे कही, दबा दे, दफना दे,
मिटा दे, कुछ कर दे,
या तो जला दे.
इसे किसी को बताने में क्या रखा है.
और जब उन्हें ही नहीं है,
तेरे दर्द से वास्ता,
तो फिर किसी और से,
उम्मीद क्यों लगा के रखा है.
बहुत गिरे हैं इस राहे-मंजिल में,
मेरी मान मेरे दोस्त,
उनके बिकने से,
तेरा गिरते रहना है अच्छा है.
परमीत सिंह धुरंधर