रहनुमाओं की खोज में, हसरतें जवाँ हो गयी,
जवानी के जोश में हम तनहा रह गए.
कब तक उछालोगे ये आज़ादी का जश्न,
सबको खबर हो चुकी है, ये रात हमें खोखला कर गयी.
और बेइंतहा मोहब्बत करते थे सितारों से हम,
अमावस की रात को, कत्ले-आम मच गयी.
अब ना हम हैं, ना वो हैं, ना जवानी का वो गुरुर,
मुफलसी है, तन्हाई है, और थोड़ी साँसे बच गयी.
परमीत सिंह धुरंधर