तालाब पे


गोरी देहात के,
आटा जाँत के,
छूटे न मुह से.
तनी दूर रही राजा जी,
बैर अभी ई टूटी ना.
बोली हजाम के,
घोड़ी लगाम पे,
रोकलो कोई से, रुकी ना.
एक बार नहा ल,
तालाब पे गोरी।
मौसम फिर अइसन, आई ना.

(She is not believing his love. He says that you would miss this love in your old age.)

परमीत सिंह धुरंधर

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