गुलशन में इतने हैं परिंदे,
क्या हैं ये सब जिन्दे?
साँसे तो चल रही हैं हवाओं की तरह,
मगर,
क्या इन हवाओं में, अब भी फूल हैं खिलते?
परमीत सिंह धुरंधर
गुलशन में इतने हैं परिंदे,
क्या हैं ये सब जिन्दे?
साँसे तो चल रही हैं हवाओं की तरह,
मगर,
क्या इन हवाओं में, अब भी फूल हैं खिलते?
परमीत सिंह धुरंधर