पिता


जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।
उस तरफ हैं महफ़िलें,
और उनकी दीवालियाँ,
और हमने अभी तक जुगनुओं से,
अपनी ये दोस्ती तोड़ी नहीं।
सुख, सत्ता और खूबसूरत जिस्म की चाह में,
कुछ दोस्त उधर जाके बैठ गए।
सम्मान, दौलत और आगोश की लालसा में,
हुस्न वाले भी वहीं के होके बस गए।
झुलस रहा है मेरा तन धुप में,
और कंठ तरस गया है, दो बून्द पानी को।
वीरान और सुनसान, इन शाखाओं को,
फिर भी, जाने क्यों और किस उम्मीद में,
अभी तक हमने छोड़ा नहीं।
क्या दौलत सजों के रखें हम,
और किस लिए।
पिता के जाने के बाद,
किसी और गोद में,
जब अब तक मैं बैठा नहीं।
जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

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