जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.
परमीत सिंह धुरंधर