ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
मेरी आँखों से बरसते आंसूं,
तुम्हारी गालों पे थिरकती हों.
थका, निराश मन, हार कर,
तुम्हारी आगोस में पनाह ले.
और एक नयी सुबह के जोश में,
उठे, बढे, संग तुम्हारे,
एक नईं मंजिल की और.
अंततः,
तुम्हारे अंगों पे,
मेरे जंगे-जीत की निशानी हों.
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
परमीत सिंह धुरंधर