मंदिर से मयखाने


मस्ती के मेरे पैमानों का,
भी क्या अंत हुआ.
अधरों तक जाते – जाते,
दिल टूट गया.
एक ही चुम्बन में मुझे,
एहसास हुआ.
मोहब्बत में बस साँसों का,
व्यापार हुआ.
एक ही रात में वो,
सब कुछ पा गयीं।
मेरा घर-संसार,
जल कर राख हुआ.
वो मयखाने से,
मंदिर की मूरत बनी.
मैं मंदिर से मयखाने,
का जाम हुआ.

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment