काजल


गम में डूबी मेरी रातों को,
तेरी आँखों का काजल बन जाने दे.
कुछ नहीं मेरे महबूब,
तो अब अपनी आगोस में मुझे पनाह लेने दे.
जब से देखा है तुझे इन आँखों ने,
अब इन्हे किसी मंजिल की चाह नहीं।
मिटने का गम हम राजपूतों को नहीं,
मगर मुझे मिटा दे तू,
मेरे सीने पे ऐसा खंजर उतर जाने दे.
तेरे ओठों की लालसा,
अब जिंदगी से ज्यादा है.
विष ही सही,
पर, अब इन्हे मुझे चख लेने दे.

परमीत सिंह धुरंधर

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