कुछ तो किस्मतों का साया है,
मोहब्बत में जिंदगी बस, जाया है.
सरहदों पे मिटने वालों की,
कब हुईं हैं ये जागीरें,
इश्क़ में रह जाती हैं,
बिना छत के ही घर की दीवारें.
फिर भी ये जूनून है,
हमारे जिस्म का,
साँसों के रुकने तक,
लगी रहती हैं हमारी उम्मीदें.
परमीत सिंह धुरंधर