सौतनें


कहीं दुपट्टा लपेटते – लपेटते,
वो परायी हो गयीं.
कहीं कंचे खेलते – खेलते,
हम जवान हो गए.
वो जब तक लौटीं,
अपने दो बच्चों के संग.
हम भी किसी के,
शौहर हो गए.
कभी काजल की डिबिया,
दिया था जो स्कूल में,
उनकी आँखों का रंग देख कर.
आज उसी को लगाती हैं,
मेरी बेगम की आँखों में,
उनकी दिलो-जान बन कर.
की बांटती है हर,
सुख-दुःख, दर्द की बातें.
बस वो ही एक राज,
अपने सीने में रख कर.
कौन कहता है की,
सौतनें, बहने नहीं होतीं.
बस रात के सफर में,
कभी साथ नहीं होतीं.

परमीत सिंह धुरंधर

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