दर्पण को कैसे निहारूं,
उनपे वो रंग अब तक है.
जो दे गए थे तुम,
वो जखम, दर्द एक साथ सब संग.
कोई रिस्ता नहीं गढ़ पाती,
वो तेरी चादर एक बुनकर,
जिस पे सोये थे तुम कभी,
साँसों के समुन्दर में बहकर मेरे संग.
परमीत सिंह धुरंधर
दर्पण को कैसे निहारूं,
उनपे वो रंग अब तक है.
जो दे गए थे तुम,
वो जखम, दर्द एक साथ सब संग.
कोई रिस्ता नहीं गढ़ पाती,
वो तेरी चादर एक बुनकर,
जिस पे सोये थे तुम कभी,
साँसों के समुन्दर में बहकर मेरे संग.
परमीत सिंह धुरंधर