तिरस्कार


हमने प्रेम में,
इतने तिरस्कार झेलें हैं.
आंसू भी निकलने से,
अब इंकार करते हैं.
चाँद कभी भी,
पलट के अमावस कर दे.
सैकड़ो सितारे भी,
इसके आगे विवस दीखते हैं.
जमाने का क्या है?
यहाँ तो सभी, दूसरों के चूल्हे,
की आग पे सेंकते हैं.
हम इस कदर,
दिल को जला चुके हैं,
हर शहर में, हुस्नवालों से पहले,
हम मयखाना ढूंढते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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