तेरी आँखों का रंग,
यूँ बदलता है,
मेरा सितम ही मुझपे,
अब भारी पड़ता है.
गुनाहों का बोझ कब तक,
उठायें.
अब तो ईमान का बोझ,
भी गुनाह लगता है.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी आँखों का रंग,
यूँ बदलता है,
मेरा सितम ही मुझपे,
अब भारी पड़ता है.
गुनाहों का बोझ कब तक,
उठायें.
अब तो ईमान का बोझ,
भी गुनाह लगता है.
परमीत सिंह धुरंधर