नया बसंत चाहिए


ग़मों में है ये जिंदगी, इसे प्यार किसी का चाहिए।
ख़्वाबों में ही सही, मगर एक साथ किसी का चाहिए।
टूट रहें है सितारे एक-एक कर,
आसमां को भी अब चाँद एक चाहिए।
कब तक भटकता रहे बादल हवाओं की मस्ती में,
अब इस आवारेपन को भी मुकाम कोई चाहिए।
बिखर गयी पंखुड़ियाँ, बागों से दूर,
अब तो इन डालों पे भी नया बसंत चाहिए।
उमड़ – उमड़ कर नदियां ने देखा सब कुछ तोड़ कर,
अब इन धाराओं को भी कोई बाँधने वाला चाहिए।
ग़मों में है ये जिंदगी, इसे प्यार किसी का चाहिए।
ख़्वाबों में ही सही, मगर एक साथ किसी का चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

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