हर मोड़ पे मयखाना खोलूँगा,
ए इश्क मुझे इस कदर नाकाम बना,
शौहर को ढूंढते हुए ओ आये बुर्के में,
और कान मरोड़ के ले जाए अपने बच्चे को.
अलविदा ना कहिये,
लौट के आने का,
मै राह देखूंगा.
लौट के भी ना आये तो,
कोई गम नहीं,
हर सुबह,
उनके दरवाजे से गुजार जाऊंगा.
कोई दीदार ना हो तो ना हो,
हवावों में उनकी खुसबू से बहल जाऊंगा.
The guy is dreaming to be fail in his love.
परमीत सिंह धुरंधर