जिन बाहों के लिए वो छोड़ गयीं,
मेरे घर के दरवाजों को.
उसी टूटे – फूटे दरवाजों की छावं में,
अपनी मसरूफियत से दूर सुस्ता लेती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जिन बाहों के लिए वो छोड़ गयीं,
मेरे घर के दरवाजों को.
उसी टूटे – फूटे दरवाजों की छावं में,
अपनी मसरूफियत से दूर सुस्ता लेती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर