लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुस्कुराना छूट गया


जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

ख्वाब ऐसे है जैसे,
धीमी -धीमी आंच पे तलती सब्जी,
और धीमी-धीमी आंच पे पकना,
अब मेरा ख्वाब बन गया.

सबकी नजर यूँ देखती हैं,
की अब,
धीमे पावँ चलना,
सीखना पड़ रहा है.
जो दिखाना चाहती हूँ,
वो सब छुपाना पड़ रहा है.
एक चुनर के सरकने पे,
ववाल इतना,
की गलियों-मोहल्लों में,
अब निकलना छूट गया.

मेरे अंगों पे जब फिसल जाती हैं,
जुल्फों से गिरती बुँदे।
तो आसमान के तले,
वो बरसात में भींगना याद आ गया.
जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

The poem is inspired by a girl sitting alone in the room, looking down and thinking something which I did not get.

परमीत सिंह धुरंधर

नहीं रखूंगी अम्मा चुनर अपने बक्षों पे


कलम आपको वो समय देखने को शक्ति देती है, जो आप लाना चाहते हो. लेकिन आप विवस हो और नहीं ला सकते। कलम, आपको अपनी असफलताओं को छुपाने का माध्यम है. दुनिया के सबसे असफल आदमी की कलम ज्यादा मुखर होती है. ये पंक्तियाँ, उन लड़कियों और महिलाओं के लिए समर्पित है जिन्हें ३१ दिसम्बर २०१६ को बंगलोरे में शारीरिक उत्पीरण का सामना करना पड़ा. कुछ लोग बस जीवन में सिर्फ लड़कियों को पाना चाहते हैं. और मैं वो समय लाना चाहता हूँ जब कोई भी लड़की कैसे भी अपनी मर्जी से जीये और जी सके.

काले – काले मन के,
पहले भ्रम को,
कैसे तोड़ दूँ मैं?
मैं नहीं रखूंगी अम्मा,
चुनर अपने बक्षों पे.
गली-गली में गुजरती हूँ जब,
खुल जाते हैं, सब खिड़की-दरवाजे।
मेरी चाल पे बजाते हैं,
सीटी, बच्चों से बूढ़े।
अपनी नयी – नयी जावानी को,
नहीं ढकूँगी अम्मा, रखके,
चुनर अपने बक्षों पे.

परमीत सिंह धुरंधर

शमा के आगोस में


समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बचपन से जवानी


तुम मिले, तो सबको चाहत हुई,
यूँ ही नहीं जिंदगी बचपन से जवान हो गयी.
तुम्हारी चाल देखके, बीच गयी सबकी आँखे,
यूँ ही तुम्हारे सीने पे, नहीं तलवारे तन गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शर्म


शर्म भी,
अब बाजार का खेल है.
जितनी महंगी होती हैं,
तुम्हारे दूकान की चीजें।
उतना ही शर्म लेकर वो,
तुम्हारे दूकान पे मुस्काराती  हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शर्म


वो भूल गयी हमको,
अपने इश्क़ के जद्दोजहद में.
उन्हें अब कुछ याद नहीं,
अपना घर बसाने के कसमोकस में.
मगर आज भी नहीं बदला हैं,
उनका वो एक अंदाज।
वो बाजार में मुस्काराती हैं, आज भी,
अपने आँखों में शर्म को उतार के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

She is Krity Olina


There is no way,
That you ignore her.
There is no way,
That you suppress her.
She is the naughty, sweet,
And the most beautiful girl.
She does not know,
How to swim.
But she knows how to dream.
She is not clever,
But she knows hot to defeat them.
There is no way,
That you distract her.
There is no way,
That you stress her.
She is smart, sweet
And the most beautiful girl.

 

Parmit Singh Dhurandhar