एक बार टूटा दिल मेरा ऐसे,
अब सौ भुजंगों का विष सह लूँ.
नारी के प्रेम से अच्छा है,
मैं शिव सा विषपान कर लूँ.
छल रहीं हैं सारी सृष्टि को,
जाने कब से अपने प्रेम में.
इनके सौंदर्य को निहारने से अच्छा है,
मैं लक्ष्मण सा पर्ितयाग कर दूँ.
बस दिखावा है इनका दम्भ,
अपने चरित्र के मान का.
इनको अपना बनाने से अच्छा है,
मैं शुक सा व्रह्मचर्य धारण कर लूँ.
परमीत सिंह धुरंधर