तू गावं की छोरी, मैं शहर का छोरा,
आज खेले हम सिलवट – लोढ़ा।
तू डाल दे हल्दी, मैं मार दूँ हथोड़ा,
रंग खिलेगा तब चोखा – चोखा।
खेत हैं तेरे सारे धान वाले,
उसमे उपजा रहा है गेहूं, बाप तेरा,
अकल है जिसमे बस थोड़ा – थोड़ा।
नयन तेरे हैं सागर से,
मैं भीं उसमे एक पल बिता लूँ.
समझा दे अपने घरवालों को,
ना छेड़ें इसको,
वरना नासूर बन जाएगा ये फोड़ा।
परमीत सिंह धुरंधर