किन दीवारों पे लिखूं तेरा नाम?
मुझे नहीं पता.
हर दीवार,
अब दुश्मन की सरहद में है.
इश्क़ इस कदर मुझे तन्हा कर देगा,
नहीं जाना था.
क्यों की मेरी हर साँस,
अब उनके गिरफ्त में हैं.
मेरी आँखे, रोशनी नहीं,
तेरा दीदार चाहती हैं.
इन्हें अब तक ये नहीं पता,
की तेरा जिस्म अब गैरों की बाहों में हैं.
परमीत सिंह धुरंधर