मंगलसूत्र


आँखों के सपने आँखों में ही रह गए,
गैर उठा के उनकी डोली ले गए.
आँखों के आंसू होंठों से चख के,
हम अपने ओसारे से देखते ही रह गए.
लाल चुनार ओढा के, मेहँदी लगा के,
गैर उन्हें मंगलसूत्र पहना गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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