अनुभव


११ साल हो गए बिछड़े। हर गुजरते साल के साथ, आँसूं तो काम होते जा रहे हैं, दर्द और यादों का बोझ बढ़ता जा रहा है. मगर पता नहीं पितृपक्ष में ना यादें आती हैं, ना दर्द होता है, न ही बोझ का एहसास। हवाओं में कोई है जो मुझे सहारा दे रहा है या मेरी साँसे बनके दिल के दर्द पे मलहम लगा रहा है, बिना बताये। तिलों में कुछ है, जो विज्ञान नहीं समझ सकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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