पुत्र मेरे, तुम नीलकंठ बनो


मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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