हार कर,
कहाँ छुप जाऊं,
ये तो बता दे खुदा।
रुसवाई है, तन्हाई है,
उसपर हैं,
ये शिकस्त की बेड़ियाँ।
मुझे उनके सर पे,
ताज का गम नहीं।
पर इस जंग में,
एक फतह तो लिख,
मेरे नाम पे खुदा।
बेवफाई है, महंगाई है,
उसपर हर तरफ,
खनकती हैं चूड़ियां।
मुझे उनकी डोली उठने,
का गम नहीं।
पर इस प्रेम में,
एक रात तो लिख,
मेरे नाम में खुदा।
आवारा हूँ, बंजारा हूँ,
उसपर मंजिलों से मिटती नहीं दूरियाँ।
मुझे अपनी, मात – पे – मात,
का गम नहीं।
पर इस खेल में,
कभी तो मेरी भी शह,
लिख दे खुदा।
परमीत सिंह धुरंधर