निहारती ही रही आईने को उम्र भर


तुम कभी समझ ही नहीं सके हमारे रिश्ते को दिल से,
तुम चाहे जितना भी पढ़ लो किताबें अपने जीवन में.
मुझे ये गम नहीं की हम एक साथ न रह सके,
तुमने कभी चाहा ही नहीं की हम साथ रहें खुशियां बाँट के.
तुम निहारती ही रही आईने को उम्र भर,
कभी खवाब संजोया ही नहीं आँखों को मूंद के.
लाखों हैं यहाँ तुम्हारे जोबन के गिरफ्त में,
मगर तुम अब भी नहीं हो किसी एक के भी वफाये – जहन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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