खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी


तुम रात भर बैठों मेरे पास आकर,
मैं दिनभर सपने देख के गुजारा कर लुंगी।
तुम बस मेरे साँसों को छू दिया करो इन ओठों से,
मैं हर खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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