वो ख्वाब भी तो न रहा


जो मुझे यकीन दिला दे,
वफाये – मोहब्बत का,
ऐसा तो कोई हुस्न नहीं।
और उनके अंगों से मोहब्बत हो जाए,
मेरा अब वो दौर भी तो नहीं रहा.
जो भी मिलती हैं,
मिलती है बस अपनी चोली को कसकर।
उन्हें क्या पता?
की इन आँखों में वो ख्वाब भी तो न रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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