जिंदगी सबकी अधूरी ही है


समुन्द्र की लहरों,
पे बैठा हर इंसान,
बस किनारों को देखता है.
और किनारों पे बैठा इंसान,
लहरों को देखता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई अँधेरे में,
तन्हाई में रोता हैं,
तो कोई भीड़ में, महफ़िल में,
अंदर-ही-अंदर,
सुलगता है, सुबकता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई हुस्न की यादों में,
कोई हुस्न की बाहों में,
आकर, समाकर,
ओठों को चूमकर भी,
किसी – न – किसी प्यास में,
निरंतर, अविराम, ही जलता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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