हम तो उग्र्र हैं अपनी जवानी में


हम भी कम नहीं हैं उस्तादी में,
बस अंतर इतना है,
की वो मौन हो के खेलते हैं बाजियाँ,
और हम थोड़े वाचाल हैं अपनी जवानी में.
उनकी तमन्ना की रौंद दें हर किसी को,
और मैं तो रौंद ही देता हूँ,
जो टकराता हैं मुझसे मेरी राह में.
हम भी कम नहीं हैं छेड़खानी में,
बस अंतर इतना है,
की वो इंतज़ार में बैठे रहते हैं,
की कब एकांत हो.
और हम तो उग्र्र ही हैं अपनी जवानी में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment