मंडप


हम दोनों के परिवार वाले नहीं मान रहे थे. इसलिए आज नदी किनारे हम दोनों भविष्य के भावी कदम  उठाने के लिए मिले थे. मेरे परिवार के सख्त विरोध की बात सुनकर उसने अपना क्रोध इस तरह ब्यक्त किया की साड़ी गलतिया मेरी ही परिवार वालो की निकलने लगी.
सुरोधी: ” तो तुम परिवार वालों के चलते मुझसे शादी नहीं करोगे। इतने दिन तक फिर ये सब क्या था? मेरे शरीर से खलने के बाद परिवार वालों का ख़याल आया. परिवार वालों से पूछ लेते पहले फिर मेरे तन पे हाथ रखते। तुम वासना से ग्रसित हो, अगर प्यार रहता तो अब परिवार की बात नहीं करते।”
मैं:”मगर क्या तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगी?”
सुरोधी: ” मैं तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ सकती हूँ. मेरा प्यार सच्चा है. तुम्हारी तरह शरीर का भूख नहीं। सब मर्द कुत्ते होते हैं.”
अंततः मैंने तय किया की परिवार के खिलाफ जाके सुरोधी को अपना बनूँगा। सुरोधी ने मुझे गले लगा लिया।

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6 महीने से मैं अपने परिवार से अलग रह रहा हूँ, कोई बात चित नहीं। इस बीच सुरोधी ने हर बार मेरी शादी की बात को टाल दिया। पिछले महीने मैंने उससे बिना पूछे ही कोर्ट में शादी का आवेदन कर दिया। आज शादी की तारीख मिलने पे, मैं सीधे सुरोधी के घर उससे बताने बताने पहुचा। सोचा पहले तो वो गुस्सा होगी पर बाद में खुश होगी ये जानकार की मैं सिर्फ उसके शरीर के पीछे नहीं हूँ.
दरवाजे को सुरोधी की छोटी बहन ने खोल और वो मुझे देख के सकपका गयी. अंदर काफी लोग थे और अचानक मुझे एक जोरदार धक्का लगा. सामने सुरोधी की सगाई का सामारोह चल रहा था, और उसकी हाथों में सगाई की अंघुठि जगमगा रही थी. उसके चेहरे पे सर्द हवाएं छाने लगी, मुझे देख कर. मैंने उसको बधाई दिया और वहाँ से निकल गया. भाड़ी क़दमों से चलता हुआ मैं बस यही सोच रहा था क्यों किया उसने ऐसा मेरे साथ. शायद लोगों ने सही कहाँ है लडकिया ऊँचे पेड़ पे चढ़ा के गिराती हैं. उन्हें बिना घर तोड़े किसी का, मंडप में बैठना पसंद नहीं है.

For the Valentine’s Day

परमीत सिंह धुरंधर

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