जोशे-जूनून


दरिया बहती रहे,
तो समुन्द्रों के ना मिलने का,
दर्द नहीं होता।
सींचते रहो मरुस्थल को,
जिंदगी में जोशे-जूनून,
फिर कभी काम नहीं होता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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