अतृप्त मन की पुकार


कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।

क्षणभंगुर जग में भ्रमित-विस्मित हर दृष्टि,
सत्य ओझल हो रहा, बढ़ती जा रही आसक्ति।
भूख-प्यास के बीच अनवरत उठती लालसा,
बढ़ती जा रही है नित मानव-मन की इच्छा।
कब तक रखोगे प्रभु निर्मल को निर्धन?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले निर्बल को तृप्ति।

नित नए स्वप्नों में उलझा यह जीवन,
पाकर भी सब कुछ रिक्त है मानव-मन।
धन, वैभव, यश सब माया की ही प्राप्ति,
फिर भी न मिटती अंतर्मन की अतृप्ति।
कब तक रखोगे प्रभु सरल पे ही विपत्ति?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले सरल को तृप्ति।

न्याय की किरण कब ऊषा बनेगी?
कब संध्या पीड़ित की पीड़ा हरेगी?
हे करुनानिधान, हे नर में नारायण
कभी तो भक्तों की भी ले लो सुधि।
कभी तो गढ़ो अरुणोदय ऐसा, मिले सब को मुक्ति।

कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
लिख रहा भक्त है, प्रभु तुमको पत्री
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।

RSD

भरम


सरेआम दिल को ठुकरा कर वो जा रहे हैं मुस्कराकर
ना रहीं अब ख्वाइशें, ना रहा कोई ही भरम.


लिख भी दूँ तो क्या लिखूं, ये कलम -दवात बता?
लिखने से भला कब मिटा हैं किसी के दिल का दरद?


थाम रहीं हैं मेरे सामने ही वो किसी की बाहों को
जाने कैसे ज़िंदा हूँ, ना हट ही रही उनसे नजर.

RSD

तराशा गया हूँ


मैं तराशा गया हूँ इस कदर दर्द में
ना कोई ख्वाब है ना कोई आशा मन में.

पंख तो फड़फड़ाते हैं हर घड़ी ही
पर ना आसमा है ना ही उड़ान नभ में.

फूल खिले हैं काँटों में, या कांटें ही साथ हैं
जिन्दी ऐसी उलझी, कुछ भी नहीं रहा बस में.

Rifle Singh Dhurandhar

किसान जमीन के हैं


ये किसान जमीन के हैं, ये पंक्षी आसमान के हैं
ये खुले बिचारो वाले निशान उस जहाँ के हैं.
और ये क्या कह रहे हो तुम सत्ता में आकर?
ये शब्द इंसान के नहीं, किसी शैतान के हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

भूख से लड़े हैं हम, क्या खूब लड़े हैं हम
मेरे आँगन से तुम्हारे आँगन तक
बूढी दादी ने पीसे जाँत, जागकर कई रातों को
उनकी साँसों का सैलाब, अब भी हमारे सीने में ज़िंदा से हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

हृदय टूटे तो टूटे, जंग में साँसे ना टूटे?
साँसे टूटे तो तो टूटे, हल हाथों से ना छूटे
तुम चाहे मीठे ख्वाब दिखा के जितना बरगला लो
सच्चे किस्से अब भी हमारी जुबान पे हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

Rifle Singh Dhurandhar

गज-ग्राह संग्राम


दो नैनों के भवर में सारा जग डूबा है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
आधा पहर ढल गया और सागर अथाह है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
सम्पूर्ण बल क्षीण हुआ, ग्रीवा तक अब नीर है
अंत समय में स्वामी अब तुम्हारा ही सहारा है.

Rifle Singh Dhurandhar

पुरवाई मैं झेल रही


मेरे मौला मैं थक गयी हूँ राहत के इंतजार में
कोई तो एक पल लिख दो, चैन मिले इस प्यार में.
आँखों में अश्क, और बेचैनी है रातो को
कब तक बैठूं यूँ खोल के किवाड़ मैं?
बेताब है टूटने को चूड़ियाँ और खनकने को पायल
दर्पण भी उल्हना मारे देख के मुझे श्रृंगार में.
अनाड़ी जाने बैठा है किस सौतन के ख्वाब में?
और पुरवाई मैं झेल रही विरहा की इस आग में.

Rifle Singh Dhurandhar

ना भींगा करों ऐसे बरसात में


ना भींगा करों ऐसे बरसात में
तड़प उठता है Crassa ऐसी रात में.

तुमको तो मिल गए हैं साथी कई
रह गया मैं ही अकेला इस राह में.

कैसे सम्भालूं एक बार बता दे मुझे?
ज़िंदा हूँ मैं बस इसी एक आस में.

कैसे उठाऊं ये गम, ए दिल बता?
हर रात निकालता है वही एक चाँद रे.

रह गया एक राजपूत नाकाम हो के
इश्क़ ने ऐसे जलाया आग में.

ऐसे ना लड़ा मुझसे अँखियाँ गोरी
बदनाम हूँ शहर में किसी के नाम से.

Rifle Singh Dhurdhar

एक कंकर सा मैं


ना शहर मेरा, ना राहें मेरी
ए जिंदगी, कैसे सम्भालूं तुझे?

ना चाँद मेरा, ना तारें मेरे
ए जिंदगी, कैसे सजाऊँ तुझे?

पुकारूँ किसे, बताऊं किसे?
जो दर्द हैं दिल में मेरे।

ना बाग़ मेरा, ना बहारें मेरी
ए जिंदगी, कैसे बहलाऊँ तुझे।

भटकना ही है किस्मत मेरी
भटकना ही है मंजिल मेरी।

ना सुबहा मेरी, ना रातें मेरी
ए जिंदगी, कैसे ठहराऊँ तुझे।

सावन में हूँ एक पतझड़ सा मैं
राहों में हूँ सबके एक कंकर सा मैं.

ना साथी कोई, ना साथ कोई,
ए जिंदगी, किसे सुनाऊँ तुझे?

Rifle Singh Dhurandhar

ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये


जिंदगी जहाँ पे दर्द बन जाए
वहीँ से शिव का नाम लीजिये।
अगर कोई न हो संग, राह में तुम्हारे
तो कण-कण से फिर प्यार कीजिये।

राम को मिला था बनवास यहीं पे
तो आप भी कंदराओं में निवास कीजिये।
माना की अँधेरा छाया हुआ हैं
तो दीप से द्वार का श्रृंगार कीजिये।

जिंदगी नहीं है अधूरी कभी भी
तो ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये।
माना की किस्मत में अमृत-तारा नहीं
तो फिर शिव सा ही विषपान कीजिये।

Rifle Singh Dhurandhar

भोर में


अँखियाँ लड़ाके पीया से सखी
निंदिया आवे रोजे भोर में.
सास दे तारी रोजे गारी
पर मीठा लागे उनकर बोल रे.

Rifle Singh Dhurandhar