तराशा गया हूँ


मैं तराशा गया हूँ इस कदर दर्द में
ना कोई ख्वाब है ना कोई आशा मन में.

पंख तो फड़फड़ाते हैं हर घड़ी ही
पर ना आसमा है ना ही उड़ान नभ में.

फूल खिले हैं काँटों में, या कांटें ही साथ हैं
जिन्दी ऐसी उलझी, कुछ भी नहीं रहा बस में.

Rifle Singh Dhurandhar

किसान जमीन के हैं


ये किसान जमीन के हैं, ये पंक्षी आसमान के हैं
ये खुले बिचारो वाले निशान उस जहाँ के हैं.
और ये क्या कह रहे हो तुम सत्ता में आकर?
ये शब्द इंसान के नहीं, किसी शैतान के हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

भूख से लड़े हैं हम, क्या खूब लड़े हैं हम
मेरे आँगन से तुम्हारे आँगन तक
बूढी दादी ने पीसे जाँत, जागकर कई रातों को
उनकी साँसों का सैलाब, अब भी हमारे सीने में ज़िंदा से हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

हृदय टूटे तो टूटे, जंग में साँसे ना टूटे?
साँसे टूटे तो तो टूटे, हल हाथों से ना छूटे
तुम चाहे मीठे ख्वाब दिखा के जितना बरगला लो
सच्चे किस्से अब भी हमारी जुबान पे हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

Rifle Singh Dhurandhar

गज-ग्राह संग्राम


दो नैनों के भवर में सारा जग डूबा है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
आधा पहर ढल गया और सागर अथाह है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
सम्पूर्ण बल क्षीण हुआ, ग्रीवा तक अब नीर है
अंत समय में स्वामी अब तुम्हारा ही सहारा है.

Rifle Singh Dhurandhar

पुरवाई मैं झेल रही


मेरे मौला मैं थक गयी हूँ राहत के इंतजार में
कोई तो एक पल लिख दो, चैन मिले इस प्यार में.
आँखों में अश्क, और बेचैनी है रातो को
कब तक बैठूं यूँ खोल के किवाड़ मैं?
बेताब है टूटने को चूड़ियाँ और खनकने को पायल
दर्पण भी उल्हना मारे देख के मुझे श्रृंगार में.
अनाड़ी जाने बैठा है किस सौतन के ख्वाब में?
और पुरवाई मैं झेल रही विरहा की इस आग में.

Rifle Singh Dhurandhar

दर्द


दर्द है, तो जी लेने दो.
सिसक -सिसक कर ही सही
दो कदम चल लेने दो.
दर्द नहीं रहा तो हम नहीं होंगे।
जब तक जिन्दा हैं
जाम पी लेने दो.

Rifle SIngh Dhurandhar

चरित्र


जब दिल टुटा था तो संभालना मुश्किल था
अब जब संभल गया हूँ, तो फिर टूटना मुश्किल है.

मुझसे मत पूछो, वो कैसी हैं, कहाँ हैं?
बता दो उनको, हम कैसे हैं, कहाँ है?

मैं कोई दुर्योधन-दुशाशन नहीं जो उनका चीरहरण करूँ
ना उनका चरित्र ऐसा, जिसे पतित करने को मैं द्रुत-क्रीड़ा रचूं।

Rifle Singh Dhurandhar

मेरी चिड़िया


मेरी चिड़िया, चुग ले दाना
छोड़ आसमा, बना ठिकाना।
तेरा है कोई, इस जहाँ में
समझ ले तू भी ये अफ़साना।
प्यासी रातें, तड़पते दिन हैं
संसार यही है, आँगन-चहचहाना।

Rifle Singh Dhurandhar

कोई नंगा दिख जाए


मोहब्बत इतना भी ना करो
की शिकायतें बढ़ जाए.
दूरियां इतनी भी ना कम हो
की दीवारें उठ जाए.
सभी इंसान हैं यहाँ
सबकी अपनी-अपनी हैं जरूरतें
खिड़कियों से ना झाँका करो
की कब -कहाँ, कोई नंगा दिख जाए.

Rifle Singh Dhurandhar

ना भींगा करों ऐसे बरसात में


ना भींगा करों ऐसे बरसात में
तड़प उठता है Crassa ऐसी रात में.

तुमको तो मिल गए हैं साथी कई
रह गया मैं ही अकेला इस राह में.

कैसे सम्भालूं एक बार बता दे मुझे?
ज़िंदा हूँ मैं बस इसी एक आस में.

कैसे उठाऊं ये गम, ए दिल बता?
हर रात निकालता है वही एक चाँद रे.

रह गया एक राजपूत नाकाम हो के
इश्क़ ने ऐसे जलाया आग में.

ऐसे ना लड़ा मुझसे अँखियाँ गोरी
बदनाम हूँ शहर में किसी के नाम से.

Rifle Singh Dhurdhar

एक कंकर सा मैं


ना शहर मेरा, ना राहें मेरी
ए जिंदगी, कैसे सम्भालूं तुझे?

ना चाँद मेरा, ना तारें मेरे
ए जिंदगी, कैसे सजाऊँ तुझे?

पुकारूँ किसे, बताऊं किसे?
जो दर्द हैं दिल में मेरे।

ना बाग़ मेरा, ना बहारें मेरी
ए जिंदगी, कैसे बहलाऊँ तुझे।

भटकना ही है किस्मत मेरी
भटकना ही है मंजिल मेरी।

ना सुबहा मेरी, ना रातें मेरी
ए जिंदगी, कैसे ठहराऊँ तुझे।

सावन में हूँ एक पतझड़ सा मैं
राहों में हूँ सबके एक कंकर सा मैं.

ना साथी कोई, ना साथ कोई,
ए जिंदगी, किसे सुनाऊँ तुझे?

Rifle Singh Dhurandhar