
मयख़ाने में पी रहा हूँ, देख तेरी तस्वीर को,
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
अँखियाँ तेरी कंटीली, छलती हर राहगीर को,
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
प्यास नज़रों से अधरों तक, अधरों से सीने में उतरती गई,
प्यास मिट जाए कभी—नसीब ऐसा कहाँ मजबूर को?
धुँधले ख़्वाबों में ढूँढता हूँ तेरी ही उस नूर को,
पा न पाया कभी तुझको, जैसे दूरी दस्तूर हो।
रात भर जागता रहता हूँ, तन्हाई के सेज पे,
नींद भी कैसे आएं, जब दर्दे-दिल भरपूर हो।
तू अगर मिल भी जाए तो, क्या मिलेगा फ़क़ीर को?
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
RSD