
लहरों का किनारों से कोई रिश्ता नहीं,
ये मज़बूरी है, कोई इश्क़ की दास्ताँ नहीं।
तुमने घर बसा लिया, बच्चे भी कर लिए,
पर आँखें कह रही हैं—ज़ख्म तुम्हारा भरा नहीं।
आसमान के परिंदे ज़मीन पर बैठे,
दाना चुगते, पंख समेटे,
यहाँ उड़ानों से कभी किसी का पेट भरता नहीं।
हम चले थे साथ कुछ दूर तक,
रास्ते बदल गए, मुक़ाम बिखर गए,
अब कोई नाम मेरे होंठों पे ठहरता नहीं।
लहरों का किनारों से कोई रिश्ता नहीं,
ये मज़बूरी है, कोई इश्क़ की दास्ताँ नहीं।
RSD